January 18, 2010

घर जा कर हमें भूल गए


विकास पाण्डेय

मै उत्तर प्रदेश के शहर प्रतापगढ़ का रहने वाला हु, जीवन का बीस साल अपनी जन्मभूमि प्रतापगढ़ में रहा आज पिछले तीन साल से हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में जनसंचारिता और पत्रकारिता कर रहा हू कॉलेज में जब जब आवकाश होता है,मेरा मन शीघ्र ही घर जाने को मचलने लगता है . मेरे पिता जी तीन दशको से दिल्ली में ही रहते हैं और कारोबार रूपी पौधे को लगाया है और बड़े ही परिश्रम से सीचा है और इस लायक बनाया की उसके फल का लुत्फ हम सारे परिवार के सदस्य उठा सके मै अपने दिल्ली वाले घर से दूर दिल्ली और नॉएडा के बोर्डर पर अपने मित्र के साथ रहता हु जहाँ से मेरा विद्दालय १२ से १५ मिनट के अंतराल पर है. अभी सर्दियों की छुट्टी में गावं से मेरी छोटी बहने दिल्ली आई थी उसी दौरान मुझे किसी काम से मुझे महज दो दिन के लिए प्रतापगढ़ जाना पड़ा दो दिन बाद जब मै घर से स्टेशन के लिए आपने सामानों को सुवय्वाथित कर ही रहा था तभी शर्ट कि जेब से विचलित[क्येकि मेरे चहेरे छोटे भाई ने मोबाइल से वो जानी पहचानी सिंग टोन को बदल कर कुछ बच्चो जैसा लगाया था ] कर देने वाली आवाज़ सुनी देखा तो वो मोबाइल से ध्वनी तरंग उठ रही थी,जब मैंने जवाब में स्क्रीन पर बने एस को छू कर हेल्लो कहा तो वहां से मेरी छोटी बहन की आवाज़ आई भैया आप वहां जा कर हम सब को भूल गए.अब मै क्या कहता बात जो सही कह रही थी . लेकिन फिर भी मैंने कहाँ नहीं तो यहाँ आने के बाद समय कहाँ मिला खैर वहां के बाद जब मै घर में सबसे मिलते जुलते घर से निकला तो एक बात बहुत ही परेशान किये जा रही थी कि मुझे माता जी,पिता जी और छोटी बहनों कि याद क्यों नहीं आई.अभी से ये हाल है तो बाद में क्या होगा[आये दिन अखबार में,बड़ो के मुह और आध्यत्मिक गुरुओ के मुखार बिन्दुओ से यह सुनने को मिलता है कि आज के बच्चे आधुनिक होते जा रहे है और उनका आपने घर वाले से स्नेह,लगाव बहुत कम होता जा रहा है]मन में चल रहे उलटे पुलते विचारों से अपने आप में ग्लानी महसूस हो रही थी,कि ऐसा क्यों हुआ, गावं कि कच्ची सड़को को बाद फिर शहर कि भीड़ में रास्ता तलाशने के साथ साथ मन में चल रहे इस बात का उत्तर पाने में भी सफल हो रहा था और अंत में कुछ बाते स्पष्ट हुई कि इसमें मेरा नहीं मेरा पिताजी और मेरे घर वालो कि ग़लती है कि बचपन से ही जो संयुक्त परिवार के परिवेश में पला बड़ा,चाची जी,माता जी,और दादी में कभी कोई अंतर समझ नहीं आया,सात बहनों और छः भाइयो के बीच सगे से भी बढ कर स्नेह रहा.बचपन में तो ऐसा लगता था कि सभी का घर ऐसा ही होता है ,लेकिन ऐसी भ्रांतियां दूर हो जाती थी जब आपने ही पड़ोस में लोगो को लड़ते सुनता और देखता था.संयुक्त परिवार की खुशियों भरे पलो का बालमन पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा था कि आज भी जब उन लम्हों को याद करता हु तो आनंद कि अनुभूति होती है और अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझता हु,जो मुझे संयुक्त परिवार का हिस्सा बना..

आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतज़ार रहेगा,
आलोचनाओ का सम्मान रहेगा




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