March 2, 2010

ऐसा विकास किस काम का .......




जब भी बात उठती है सहनशीलता की शर्म हया की तब हम नारी का जिक्र करते हैं, की हमारी भारतीय नारी सहनशीलता शर्म हया की देवी होती है। हमारे देश में नारी को देवी का दर्जा प्राप्त है, हम पूजा करते हैं इनकी।

लेकिन जब भी बात उठती है अपने मन के विचारों को प्रकट करने की , अपनी भावनाओ को को लेकर खुले मन से बात करने की , स्वछंद हो के खुले आस्मां में अपने मन की मनमानी करने की तब भी हम हमारी भारतीय नारी को दबा कुचला पाते हैं।
कभी कभी सोच के मन बहुत विचलित हो जाता है की ये कैसा समाज है हमारा जहाँ १ तरफ हम नारी को शक्ति की देवी मान के पूजा करते हैं , तो दूसरी तरफ महज कुछ दहेज़ के पैसो के लिए जला देते हैं। कितना दोगला पन है इस समाज में।
कई बार देखने में आया है की जिसको हम रक्षक समझते हैं वही भक्षक निकलता है।
मेरे शहर में जो नारी समाज कल्याण के अध्यक्ष थे उनोहोने ही अपने बेटे की शादी के २ साल बाद अपनी बहु को दहेज़ के लिए के मार दिया ।
हर चीज में हमने आज बहुत तरक्की कर ली है और सामाजिक तौर पर भी हम आज बहुत मजबूत हो गए हैं। लेकिन आज भी जब बात आती है नारी की तो हम सब फिर से गैर जिम्मेदार और १ बिना विकसित दिमाग वाले इन्सानकी तरह सोचने लगते हैं।
अगर लड़की घर से बहार जा रही है तो किस रस्ते से जाऐगी, क्या पहेन के बहार जाऐगी। कई बार यहाँ तक होता है की अपने मोबाइल में किसका नंबर रखन है किसका नहीं ये फैसल भी उसका नहीं होता है। हम विकास कर रहे हैं समाज की भलाई के लिए और उन्नति के लिए लेकिन अगर समाज के १ वर्ग को दबा दिया जाऐगा तो ऐसा विकास किस काम का।

9 comments:

Udan Tashtari said...

विचारणीय...स्थितियाँ बेहतर हुई हैं पहले से.

'अदा' said...

sochne ko mazboor ho gaye ..
bahut badhia..

निर्मला कपिला said...

विचारणी बात है। शायद स्थिती मे बदलाव की गति बहुत धीमी है मगर पहले से कुछ सुधार हुया है। और आशा है आगे जब आप जैसे पढे लिखे लोग आयेंगे तो जरूर और सुधार होगा। धन्यवाद

Mithilesh dubey said...

देवेश भाई ये स्थिति बेहद दुखःद है , हम हमेशा दोगले पन से हार जाते हैं ।

निशाचर said...

देवेश जी, भारत युवाओं का देश है. वह पश्चिमी अपसंस्कृति को सहज और सहर्ष स्वीकारने को तैयार हैं लेकिन पश्चिम की अच्छाइयों को अपनाने को उत्सुक नहीं. यदि किसी विवाहिता का पति अपने परिवार वालों के अत्याचार के खिलाफ अपनी पत्नी का साथ देता है तो कोई कारण नहीं कि विवाहिता के प्रति इस तरह के अत्याचार समाप्त न हो जाएँ. वास्तव में संस्कृति की दुहाई देने वालों के साथ-साथ नयी संस्कृति के वाहकों में भी दोगलापन कम नहीं. क्या आज के पढ़े - लिखे युवा दहेज़ जैसे अभिशाप के दुष्परिणामों को नहीं समझते? फिर भी वह दहेज़ "वसूलने" में किसी से पीछे नहीं. दोगलापन हर और व्याप्त है.

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !

श्याम कोरी 'उदय' said...

....प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!

RaniVishal said...

Aapke sawl bahut vicharniya hai aur soch bahut gahari va prabhavshali! kahane ko aaj ham unnat samaj me hai lekin buraiya samapt nahi hui bas unke rup badal chuke hai....phale jo log khuli jabaan se sabake samane dahej mangate the aaj sabhyata ka swang racha kar bas gift lete hai wo bhi khud ke liye nahi bad apani beti ko dijiye yahi kaha kar............!!
Sochane ki abhi bahut gunjaaish baaki hai aur kuch karana nittant aavshyak.....bhadiya aalekh!

दिगम्बर नासवा said...

आजकल विकासके मायने बदल गये हैं ..... हर चीज़ को देखने का पैमाना बदल चुका है

एक नज़र इधर भी

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