
ए चाँद क्या तू मेरे महबूब का हाल बता देगा ।
अरसा होगया उसके शहर में मैंने कदम नहीं रखा ।
क्या वो वैसा ही है जैसे वर्षों पहले मैंने देखा था ।
या फिर इस नाटकीय दुनिया में ,
उसने भी अपना रूप बदल लिया ॥
ए चाँद तू उसकी अदाएं तो रोज देखता होगा ।
क्या उसकी चंचलता आज भी वैसी है
जैसे पहले एक बच्चे की तरह
चंचल मन से घुमा और रहा करती थी।
या फिर वक्त थपेडों ने उसके
जीने का सलीका बदल दिया ॥
क्या आज भी वो सांझ को घर की
देहली पर दिया जलाती है ।
या फिर सांझ में दिया जलाने का
रिवाज मिटा दिया ॥
क्या आज भी उसकी आँखों में
खुशियों के मोती छलकते है ।
या फिर समय के चक्रव्यु ने
उन मोतियों को गिरा दिया ॥
ए चाँद वो मिल जाये तो उससे कहना वो सख्स
जो वर्षों पहले तुम्हारी याद में रात भर जागता था ,
आज भी वो तुम्हारी तस्वीर को आँखों में सजाकर रखा है ।
तुम्हारी याद में रोते रोते आँख से आंसू तो
सूख गये लेकिन सुर्ख आँखों से आज भी वो रोता है ॥
24 comments:
क्या आज भी वो सांझ को घर की
देहली पर दिया जलाती है ।
या फिर सांझ में दिया जलाने का
रिवाज मिटा दिया ॥ ------- सुन्दर भाव देवेश जी। चाँद का सहारा लेकर आपने बहुत कुछ कह दिया।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं.... बहुत सुंदर कविता....
बेहद ही खुबसूरत और मनमोहक...
वाह देवेश भाई...जबरदस्त!!
एक अपील:
विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.
हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.
-समीर लाल ’समीर’
शहर बोल दे यार। हम भी पता कर आते हैं?
'जो होना चाहिए' पर 'जो हो रहा है' का डर!
वाह!
बहुत बढ़िया देवेश भाई....
कुंवर जी,
kya kehne..
bahut hi sundar rachna...
padhkar achha laga...
yun hi likhte rahein...
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mere blog mein is baar...
जाने क्यूँ उदास है मन....
jaroora aayein
regards
http://i555.blogspot.com/
बहुत ख़ूबसूरत यादों का सफर और चाँद से इल्तिजा...
देवेश बाबू आप त चाँद को अपना हाल बता कर संतोस कर लिए...तनी सोचिए आपका महबूब का हाल कैसा होगा... अब त आप फिरी हो गए हैं, त जाकर मिल आइए... भगवान आपको आपका महबूब से मिला दे!!
अच्छा मानवीकरण ।
...बेहतरीन!!!
सुन्दर अभिव्यक्ति .........अच्छी कविता ...पढ़कर अच्छा महसूस हुआ
http://athaah.blogspot.com/
maza aa gaya bhai
...आपके सहपाठी विकास पाण्डेय जी को खोजते हुये यहां आ गया ....!!!!
kya bat ahi ...... aap ne to jaan daldiye hai shabdo me aapne vicharo ke madhyam se
क्या उसकी चंचलता आज भी वैसी है
जैसे पहले एक बच्चे की तरह
चंचल मन से घुमा और रहा करती थी।
या फिर वक्त थपेडों ने उसके
जीने का सलीका बदल दिया ॥
......
log kahte hain ab kavi kahan , aadhunikta ke nashe se bahar aakar dekhen log kavi aaj bhi wahan pahunchta hai, jahan n pahunche ravi
खूबसूरत भावाभिव्यक्तियाँ....बधाई !!
chaand ke bahane sabkuchh kah dia aapne...khubsurat kavita.
ऐसा भी होता है प्यार में मेरे दोस्त.. ऐसा भी होता है.....
सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रूप से प्रस्तुत किया है! लाजवाब रचना!
Wah! Iske alawa aur kuchh kah nahi sakti!
आप सब का यह स्नेह .....हमें एक नयी ऊर्जा देता है ........बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का
bahot sunder.
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