July 31, 2010

जाने क्यूँ इतना याद आते हो .....

देवेश प्रताप


बिन बरसात के आज भी तुम
बरस
जाते हो
जाने क्यूँ इतना याद आते हो

सावन
के झूलों की तरह ,
आज भी मन को झुला जाते हो
जाने क्यूँ इतना याद आते हो

तुम
यूँ चले तो गए मेरी दुनिया से दूर
इन
आँखों से दूर कैसे जाओगे
आज
भी इन नैनों में आंसू बन
कर
छलक जाते हो ,
जाने
क्यूँ इतना याद आते हो

वादों
की लकीरों को तुम पार
कर के चले गए ,
मन की लकीरों को कैसे
पार
कर पाओगे
दिल
की गली से यूँ ही
गुजर
जाते हो
जाने
क्यूँ इतना याद आते हो

24 comments:

संजय भास्कर said...

तुम यूँ चले तो गए मेरी दुनिया से दूर
इन आँखों से दूर कैसे जाओगे
आज भी इन नैनो में आंसू बन
कर छलक जाते हो ,
जाने क्यूँ इतना याद आते हो ॥

कुछ अलग......परन्तु सुन्दर रचना...मनभावन सी गाने लायक

संजय भास्कर said...

तुम यूँ चले तो गए मेरी दुनिया से दूर
इन आँखों से दूर कैसे जाओगे
आज भी इन नैनो में आंसू बन
कर छलक जाते हो ,
जाने क्यूँ इतना याद आते हो ॥

कुछ अलग......परन्तु सुन्दर रचना...मनभावन सी गाने लायक

संजय भास्कर said...

मनमोहक अन्दाज में बहुत सुन्दर कविता

संजय भास्कर said...

bahut khoob devesh bhai...........me to fan ho gaya apka

kshama said...

वादों कि लकीरों को तुम पार
कर के चले गए ,
मन कि लकीरों को कैसे
पार कर पाओगे ।
दिल कि गली से यूँ ही
गुजर जाते हो
जाने क्यूँ इतना याद आते हो ॥
Yah ek sundar geet hai jise gungunaka man karta hai!

Ravi Rajbhar said...

Bahut sunder...
dil ko chhu liya bhai deves ji aapne.

www.ravirajbhar.blogspot.com

Virendra Singh Chauhan said...

Kya baat hai..Dost.....Dil ko choo liya..is rachna ne ..ek baar aur padta hun aur ek dusra comment likta hun

Virendra Singh Chauhan said...

वादों की लकीरों को तुम पार
कर के चले गए ,
मन की लकीरों को कैसे
पार कर पाओगे ।
दिल की गली से यूँ ही
गुजर जाते हो
जाने क्यूँ इतना याद आते हो ॥

vaise to har line gazb ki hai ......lekin ye lines mujhe bahut achhi lagi.


ye lines bhi bahut khaas hain..
इन आँखों से दूर कैसे जाओगे
आज भी इन नैनो में आंसू बन ..


Behtreen.......Rachna.

rahul kishore said...

kya gazab ki baate likhi hai aapne bhai.
iss rachna k har ek pankti me woh dum hai ki sidhe dil ko chhu jata hai bhai.
issi tarah nayi-nayi or achhi achhi rchna hume padhne ka mouka diya karo. n i be came a big fan of urs dude.

Sanjeev Kumar Sharma said...

wow,devesh bhaiya..ekdum situational lines hain.....aaj main jis condition me hu us pe bilkul fit baithta hai....aise hi lines likhte rahiye hum ashiqo ko kuch to raahat milegi...

Sanjeev Kumar Sharma said...
This comment has been removed by the author.
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...


बहुत मासूम सा सवाल है यह और उतनी ही मासूमियत से बयान भी हुआ है।

…………..
प्रेतों के बीच घिरी अकेली लड़की।
साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

moni said...

very nice lines i like thats "jane kyu itna yaad aate ho "

ana said...

prayas achchha lagaa......good

अनिल कान्त : said...

kya baat hai !!

Akhtar Khan Akela said...

bhut achche andaaz men virh ki tpn byaan ki he yaad isiliyen aate hen ke unhen hm bhul gye or ab kevl unhen yaad rkhnaa pdhrhaa he jo yaad aate hen voh dr rhte hen or jo yaad rhte hen voh hmeshaa aath rhte hen . akhtar khan akela kota rajsthan

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

shama said...

Badihi manbhavan rachna hai!

अनामिका की सदायें ...... said...

वादों की लकीरों को तुम पार
कर के चले गए ,
मन की लकीरों को कैसे
पार कर पाओगे ।
दिल की गली से यूँ ही
गुजर जाते हो
जाने क्यूँ इतना याद आते हो

यादो का अपना कोई वजूद नहीं होता अगर हम अपने चिंतन का खाद पानी उसमे ना डाले तो.
तो यादे तो हमारी सोच की ही उपज है.
बहुत खूबसूरत शब्द दिए है एहसासों को.
सुंदर रचना.

सम्वेदना के स्वर said...

सावन की झड़ी और ऐसे में आपकी कविता में वर्णित वियोग...सावन में आग लगाएंगे या आसमान को और रुलाएंगे!!

शहरोज़ said...

अत्यंत सहज ,लेकिन प्रभावी !!
समय हो तो पढ़ें
मीडिया में मुस्लिम औरत http://hamzabaan.blogspot.com/2010/07/blog-post_938.html

देवेश प्रताप said...

आप सब का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ....इसी तरह हौसला अफजाई करते रहिये .

महफूज़ अली said...

बहुत सुंदर और लाजवाब...

Anonymous said...

Great post, I am almost 100% in agreement with you

एक नज़र इधर भी

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