August 3, 2011

घर से निकला था ....

देवेश प्रताप


घर से निकला था कुछ कोरा कागज
लेकर

सोचा था एक दास्ताने ब्याँ
लिखूंगा

वक्त एक कलम बनकर हाथ
में आगई

कोरे कागज पर वक्त की कलम
चलने लगी

ज़िन्दगी ख़ुद अपनी दास्ताँ
ब्याँ करने लगी

हर मोड़ पर एक नई कहानियाँ
बनने लगी

5 comments:

kshama said...

वक्त एक कलम बनकर हाथ
में आगई

कोरे कागज पर वक्त की कलम
चलने लगी
Nihayat sundar!

कविता रावत said...

ज़िन्दगी ख़ुद अपनी दास्ताँ
ब्याँ करने लगी
हर मोड़ पर एक नई कहानियाँ
बनने लगी

...jindagi ka yahi to fasana hai..
bahut badiya rachna...

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने
..... सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

Mohan S Rawat said...

kuchh modh aise aaye jahan kalam atakne lagi
aur kuchh modh aise aaye jahan kalam phisalne lagi
par ghabrao na mere yaaron
woh modh bhi phir jald hi aaye jahan kalam phir sambhalne lagi


bahut khoob Devesh bhai, ab supply jaari rakhein

sapna Jain said...

bahut pyari lines hai dev....good

एक नज़र इधर भी

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