December 27, 2009

वक्त अहसास दिलाता ....

देवेश प्रताप
वक्त से बढ़कर कुछ नहीं । इस बात का अहसास अक्सर समय निकल जाने का बाद होता है । ऐसे ही कुछ वक्त की बीती हुई बातें मेरी भी है । बचपन से पता नहीं क्यों किताबो से कोई लगाव नहीं हो पाया । पढने में कभी मन ही नहीं लगता और जब भी कोई पढने के लिए कहता तो वो शब्द फासी की तरह लगते थे । मै उन किताबो को इस तरह घूरता था जैसे मेरी किताबो से कोई पुरानी दुश्मनी हो । लकिन वक्त की सूयियो ने ये अहसास दिलाना शुरू कर दिया की काश बचपन की किताबो से दोस्ती कर लिया होता । लेकिन फिर भी कहते है की ''जब जागो तब सबेरा'' आज maas communication & journalism की पढाई कर रहे है । आज कोई भी अच्छी किताब देख कर मन में उसे पढने के लिए उसी तरह बूख जागती है जैसे भूखे शेर के सामने हिरन का बच्चा हो । लकिन कभी-कभी आसीमित ज्ञान की वजह से अपने आप को अज्ञान रुपी कोठरी में पाता हु । और पछतावा होता है तो सिर्फ इस बात का की काश बचपन से ही अच्छे से पढ़ा होता तो शायद आज का वर्तमान और आने वाला भविष्य उज्जवल मय दिखाई देता ।

2 comments:

Ramesh Maurya said...

Devesh ji,

Bachpan me jo sikha jo padha uska natija hai ki aap is mukaam par hain....choriye jo nahi kar paiye....shukriya kariye apna aur uper wale ka jo aaj is mukaam par hain....apni chat ki railing se aap agar niche dekhange to aapko 10 minute me 20 aise chehare dikh jainge....jo sirf paida ho gaye hain is duniya me lekin unko ye nahi pata ki karna kya hai.....to bachpan ki un achi yaado ko gale se lagaiye....aur jis mukaam par aap hain wahan pauchana kuch logo ka (mera) sapna hai..jo pura nahi ho saka. aur ujjwal bhavishya kitabi kida banane se nahi hota....ujjwal banana hai to prathmikta dejiye apne wajood ko aur nirantar prayas se sab sambhav ho jata hai........

VICHARO KA DARPAN said...

dhyanabaad ramesh ji ....aap jaise hi logo ki wajhe se khud ko safalta ki charam tak pauchne ka jazbaa ata hai .

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